वो सरवरे किशवरे रिसालत जो अर्श पर जलवागर हुए थे।
नए निराले तरब के सामाँ अरब के मेहमान के लिए थे।।
बहार है शादियाँ मुबारक चमन को आबादियाँ मुबारक।
मलक-फ़लक अपनी-अपनी लय में ये घुर अनादिल का बोलते थे।।
वहां फ़लक पर यहां ज़मी में रची थी शादी मची थी धुमें।
उधर से अनवार हंसते आते इधर से नफ़हात उठ रहे थे।
ये छुट पड़ती थी उनके रूख़ की कि अर्श तक चांदनी थी छिटकी।
वो रात क्या जगमगा रही थी जगह-जगह नस्ब आइने थे।।
ख़ुशी के बादल उमंड के आए दिलों के ताउस रंग लाए।
वह नग़मए नअत का समाँ था हरम को ख़ुद वज्द आ रहे थे।।
उतार कर उनके रूख़ का सदका़ ये नुर का बट रहा था बाड़ा।
कि चाँद सुरज मचल-मचल कर जबीं की ख़ैरात मांगते थे।।
बचा जो तलवों का उनके धोवन बना वो जन्नत का रंगो रोग़न।
जिन्होने दुल्हा की पाई उतरन वो फूल गुलज़ारे नूर के थे।।
नमाज़े अ़क्सा में था यही सिर अयाँ हों मअनए अव्वल आख़िर।
कि दस्त बस्ता हैं पीछे हाज़िर जो सलतनत आगे कर गए थे।।
थके थे रूहुल अमीं के बाज़ु छुटा वो दामन कहां वो पहलु।
रकाब छुटी उम्मीद टुटी निगाहे हसरत के वलवले थे।।
ख़िरद से कह दो कि सर झुका ले गूमां से गुज़रे गुज़रने वाले।
पड़े हैं यहां ख़ुद जिहत को लाले किसे बताए कहाँ गए थे।।
वही है अव्वल वही है आख़िर वही है बातिन वही है ज़ाहिर।
उसी के जलवे उसी से मिलने उसी से उसकी तरफ़ गए थे।
नबीए रह़मत शफ़ीए उम्मत "रज़ा" पे लिल्लाह हो इनायत।
उसे भी उन ख़लअतों से हिस्सा जो ख़ास रह़मत के वाँ बटे थे।।
✍️कलाम सय्यदी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़िले बरेलवी अलैहिर्रमतुर्रिज़वान
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🖌पोस्ट क्रेडिट - शाकिर अली बरेलवी रज़वी व अह्-लिया मोहतरमा
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